संदेश

Reservations Needs a Review!

चित्र
  source: Internet सीजेपी और छात्रों के जंतर मंतर पर वृहद् विरोध प्रदर्शन के बाद, अचानक आरक्षण विरोध ने एक सुर पकड़ लिया। कैसे? यह राजनीति की एक सोची समझी चाल लगती है ताकि युवा जो कि अपने भविष्य के लिए वोट-बैंक की राजनीति से बाहर निकलकर अपने लिए सोच रहा था, उनके अपने-अपने खेमों में बाँटकर अलग-थलग किया जा सके। सोशल मीडिया(फ़ेसबुक) पर अचानक मेरी फीड में इस तरह के लेखों, कमेंट्स की जैसे बाढ़ सी आ गयी। इसलिए इस विषय पर लिखने से ख़ुद को मैं रोक नहीं पाया। जब बात आरक्षण पर बहस की आती है तो सीधा निशाना- अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों पर होता है। क्योंकि प्रत्यक्ष तौर पर सीधे आरोप नहीं लगाये जा सकते है इसलिए यह बात कथित सवर्ण परोक्ष रूप में करते है। आरक्षण के विषय में आरोप दो तरह से लगते हैं- इन लोगों में क़ाबिलियत नहीं होती है और ये कम अंकों में भी डॉक्टर/ इंजीनियर वगेरह बन जाते हैं। क्योंकि ये कम अंकों में भी नौकरी पा जाते हैं तो इसलिए सिस्टम में प्रोडक्टिविटी घट जाती है। अब इसे विश्लेषण से समझिए:  पहला, क़ाबिलियत को केवल अंकों से नहीं आँका जा सकता है। यही भावना भारत समेत वि...

Homebound: आगे क्या लिखते हो!

  नीरज घेवान 'मसान’ जैसी दमदार फ़िल्म भारतीय सिनेमा को दे चुके है।होमबाउंड उनकी प्रतिभा की अगली कड़ी है।नीरज मुझे आज के श्याम बेनेगल नज़र आते है। उनकी कहानियाँ हमेशा आपके आस पास     और समाज के निम्न मध्यमवर्ग के हिस्से की होती है। इस फ़िल्म का बेसब्री से इंतज़ार था, तब से जब से जब से इस फ़िल्म के बारे में पता था।21 नवम्बर को यह आख़िरकर ओटीटी पर आ गयी। फ़िल्म का मुख्य पहलू 'पहचान' है।वह पहचान आपकी कमाई पहचान नहीं है।यहाँ 'पहचान' आपके नाम की है।मतलब आपके जन्म की पहचान से है।नीरज का मार्टिन स्कोर्सेज़ के साथ एक इंटरव्यू है जिसमें वह शेक्सपियर के 'नाम में क्या है?'वाली बात पर कहते है-"शेक्सपियर को भारत आना चाहिए, वो देखते कि यहाँ नाम कहते ही आपके प्रति धारणा तय हो जाती है" फ़िल्म होमबाउंड में कई दृश्य है जिसमें पहचान और उसे पहचान को देखते    ही उपजती नफ़रत सामने वाली आँख में नमूदार होती है।ऑफिस वर्कर 'शोएब' से कहना कि कल से तुम हमारा बोतल मत भरना हम ख़ुद भर लेंगे…और तुरन्त उसके बाद "अपना काम ख़ुद करना चाहिए ना! इसलिए कह रहे हैं" दिल क...

अपनी अपनी प्राथमिकताएँ!

चित्र
  ज्ञान और अज्ञान:अपनी अपनी प्राथमिकताएँ   21 अक्टूबर 2024 को विज्ञान प्रसार बंद कर दिया गया।हालांकि यह निर्णय सितम्बर 2023 में केंद्र सरकार द्वारा लिया गया था। बताते चलूँ कि विज्ञान प्रसार बीते ज़माने की इक संस्था हुआ करती थी जो 1989 में आम लोगों तक विज्ञान और वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गयी थी।तब यह एक सोसाइटी के रूप में बनायी गयी थी जो बाद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के द्वारा नियोजित एक स्वायत्त संस्था बनी।विज्ञान का जन जन तक प्रचार इसका मुख्य उद्येश्य रहा। साल 2011 में मैंने पहली बार इस संस्था के बारे में अपने एक साथी से जाना।उस दौर में इंटरनेट आम लोगों तक बस अपने पैर पसार ही रहा था।एक सादे काग़ज़ पर विज्ञान प्रसार को एक चिट्टी लिखी और जितने बच्चों को मैं तब पढ़ाता था सबके नाम लिखकर सूचित किया कि एक विज्ञान क्लब बना रहा हूँ।साधारण डाक से ही भेजा।लगभग दो महीने बाद वहाँ से कुछ विज्ञान पर किताबें और DREAM 2047 आनी शुरू हो गयी। DREAM 2047 एक द्विभाषी पत्रिका थी।ग्लॉसी काग़ज़ पर एक ओर से हिन्दी और दूसरी ओर से अंग्रेजी में छपी होती थी।विज्ञान की नयी ख...

पिनाथ ट्रैक: बारिश, अँधेरा और जंगल

चित्र
  पिनाथ और बूढ़ा पिनाथ   कोई ऐसा ट्रैक किया कभी जिसको 'सर्वाइवल’ जैसा दर्ज़ा दिया जा सके? कम से कम हमारे लिए यह सर्वाइवल ही था! किसी की भावनायें आहत हो तो वो आगे पढ़ने का जोखिम ना ही उठाये। इस बार का ये ट्रैक चमोली के ब्रह्मताल और रूपकुंड को 'पैसे की बर्बादी' का तमग़ा देकर आख़िरकार बागेश्वर में ही कौसानी के नज़दीक पिनाथ तय किया गया।अपने कॉलेज के एक साथी-ललित जिसका मोबाइल नंबर आज भी फ़ोन में 'ललिया' के नाम से सेव है; के साथ दशहरे की छुट्टियों में 'कहीं चलेंगे' तय हुआ था।ललित का आना मतलब उसके साथ कामेश का वैसे ही होना जैसे ढेर सारी सब्ज़ी लेने पर मुफ़्त में धनिया और हरी मिर्च का आना। जैसे वो सब्जी का स्वाद बढ़ाते हैं, कामेश का साथ होना किसी भी यात्रा को हमारे लिए आसान और मज़ेदार दोनों बनाता है।ग़ौरतलब है कि ललित को हर ट्रैक मैं सुविधायें एसी फ़र्स्ट क्लास वाली    चाहिए होती है, और चाहिए केमू की बस के किराए के ख़र्च पर! शायद ' हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चोखा’ वाली कहावत के उद्धरण ललित जैसों के लिए ही बने है। बहरहाल, तो एक दो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बाद स्...

खाली होते पहाड़ की कहानी- भूतगाँव

चित्र
  ना ना! यह कोई हॉरर उपन्यास नहीं है। पहाड़ में ख़त्म होते पहाड़ की कहानी है- भूतगाँव। दो समानान्तर चलती कहानियों का उपन्यास है यह।वर्तमान और भूत को एक साथ एक धागे में एक के बाद एक मनका पिरोने जैसा अनुभव है यह उपन्यास। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित नवीन जोशी जी का हालिया उपन्यास है भूतगाँव। आज से ठीक दो साल जब पहले 'पिथौरागढ़ किताब कौतिक' से पहले लेखक नवीन जी से होटल के उस कमरे में लगभग ढाई घंटा बात की थी, तो उन्होंने बताया था कि 'बाघैन’ को ही एक उपन्यास की शक्ल देना चाह रहे हैं।हालाँकि उनकी कहानी बाघैन मैंने तब नहीं पढ़ी थी अब भी नहीं पढ़ी है।पर उसे इस उपन्यास की शक्ल में पढ़ना एक सुखद अनुभव रहा। पहाड़ में ख़ाली होते गाँवो और पलायन को बेहद मार्मिक तरीके से कहानी वाचक 'आनन्द सिंह' और उसके कुत्ते 'शेरू' के बीच के संवादों ने धार दे दी है।अस्सी नब्बे के दशक में जन्मे लोग इस कहानी में कई जगह उन किस्सो और बीती बातों से रूबरू होंगे जिन्हें वे शायद भूल ही चुके होंगें।इस आधुनिक दौर के मोबाइल मायाजाल के बीच आपको पहाड़ की सांस्कृतिक धरोहर और लोक संस्कृति के विविध अंश कई ...