Reservations Needs a Review!

 

source: Internet

सीजेपी और छात्रों के जंतर मंतर पर वृहद् विरोध प्रदर्शन के बाद, अचानक आरक्षण विरोध ने एक सुर पकड़ लिया। कैसे? यह राजनीति की एक सोची समझी चाल लगती है ताकि युवा जो कि अपने भविष्य के लिए वोट-बैंक की राजनीति से बाहर निकलकर अपने लिए सोच रहा था, उनके अपने-अपने खेमों में बाँटकर अलग-थलग किया जा सके।

सोशल मीडिया(फ़ेसबुक) पर अचानक मेरी फीड में इस तरह के लेखों, कमेंट्स की जैसे बाढ़ सी आ गयी। इसलिए इस विषय पर लिखने से ख़ुद को मैं रोक नहीं पाया।

जब बात आरक्षण पर बहस की आती है तो सीधा निशाना- अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों पर होता है। क्योंकि प्रत्यक्ष तौर पर सीधे आरोप नहीं लगाये जा सकते है इसलिए यह बात कथित सवर्ण परोक्ष रूप में करते है। आरक्षण के विषय में आरोप दो तरह से लगते हैं-

  1. इन लोगों में क़ाबिलियत नहीं होती है और ये कम अंकों में भी डॉक्टर/ इंजीनियर वगेरह बन जाते हैं।
  2. क्योंकि ये कम अंकों में भी नौकरी पा जाते हैं तो इसलिए सिस्टम में प्रोडक्टिविटी घट जाती है।

अब इसे विश्लेषण से समझिए: 

पहला, क़ाबिलियत को केवल अंकों से नहीं आँका जा सकता है। यही भावना भारत समेत विश्व के अन्य देशों के विधि- विधाता समझते है।फ़र्ज़ कीजिए, एक व्यक्ति की पहली जनरेशन सरकारी नौकरी में आती है और दूसरे की पुश्तें वहाँ क़ाबिज़ रही हैं। क्या दोनों के लिए केवल 'अंकों  का निर्धारण' योग्यता तय कर सकता है? संभव ही नहीं है। भारत में जाति व्यवस्था के तहत आने वाले सवर्णों के पास अपना एक 'social capital' है जिस कारण उनके लिए 'जानकारी की सुगमता, आर्थिक बेहतरी और अवसरों की अधिक उपलब्धता' है। यह समाज में कथित निम्न जातियों के पास आज भी संभव नहीं है। Ministry of Education का आधिकारिक डेटा कहता है कि 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल 01 कुलपति अनुसूचित जाति से आते हैं। आज तक भारत में कैबिनेट सेक्रेटरी की पोस्ट पर अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व शून्य (0) है।सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक डेटा कहता है कि 1950 के बाद से आज तक 270 से ज़्यादा जज नियुक्त हुए जिनमें मात्र 06 अनुसूचित जाति से आते हैं( कुल प्रतिशत 0.02%)। UDISE की रिपोर्ट्स के अनुसार अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों का ड्रॉप-आउट रेट 18.65 % है, जबकि कथित सवर्ण छात्रों का 5% मात्र है। दलितों पर अत्याचार कि बात तो क्या ही कही जाये! शिक्षा के बढ़ने के कारण जहाँ जातिगत अपराध कम होने चाहिए थे वहीं हुआ इसका उल्टा है। NCRB के डेटा के अनुसार 2024 में कुल 55685 मामले दर्ज़ हुए! ये समझिए ये वो मामले हैं जो पुलिस के रिकॉर्ड में अपनी जगह बना पाये है! वरना इससे कई ज़्यादा ऐसे होंगे जिन्हें पुलिस तक जाने ही नहीं दिया गया होगा।

अब मैं दूसरे बिंदु पर आता हूँ- कि आरक्षण के चलते प्रोडक्टिविटी कम होती है। यह कथित उच्च जातियों द्वारा अपनी कमियों को छिपाने का केवल एक बहाना प्रतीत होता है। इसका सबसे बेहतरीन जवाब है- World Development में प्रकाशित Delhi School of Economics के प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे और Michigan University के प्रोफ़ेसर थॉमस विस्कॉफ़ का शोध पत्र- Does Affirmative Action Reduce Productivity? A Case Study of the Indian Railways.

इस शोध पत्र के मुख्य बिंदु निकलकर आए वह यह थे कि आरक्षण के कारण उत्पादकता में कोई कमी नहीं देखी गयी जबकि इसके संकेत जरूर मिले कि आरक्षण और उत्पादकता में धनात्मक सह-संबंध है। यह शोध स्पष्ट तौर पर कथित सवर्णों के आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर देता है।

आरक्षण के सवालों पर जब बहस होती है तो कुछ बिंदुओं पर सवर्ण समाज चुप्पी साध लेता है। इनमें से कुछ यूँ हैं-

  1. जब बात MBBS जैसी सीट्स पर management quota की आती है तो उनका उनके पास कोई तर्क नहीं है।
  2. जब फ़र्ज़ी दस्तावेजों से नौकरी पाने वालों की सूची आती है तो वे चुप्पी साध लेते हैं।
  3. जब दलितों पर बढ़ते अत्याचारों ( उदाहरण के लिए उत्तराखण्ड में 18 साल के केतन की हत्या) पर जब बात आती है तो वे चुप है।
  4. जब रिश्वत लेते अधिकारियों के नाम प्रदर्शित होते हैं तो वे इस बारे में भी चुप हैं।
  5. शहरों में क्यों जमीनों की खरीद में 'Only General' लिखा होता है तो वे इसका विरोध नहीं करते।    

ऐसे तमाम उदाहरण है। पिथौरागढ़- धारचूला(उत्तराखण्ड) में कई उच्च जातियां हैं जिनका आज के समय में ओबीसी कोटे में एकाधिकार है। पर नौकरी पाने के बाद (अक्सर अनुसूचित जाति से भी कम अंक) वो ख़ुद को 'सवर्ण' के ठप्पे से बाहर नहीं करते। EWS में धांधली की बात जितना कम करूँ उतना कम है। उत्तराखण्ड में शहरों में जिन्होंने किराए पर मकान चढ़ाये है, वो इस श्रेणी के तहत नौकरी का लाभ ले रहे हैं और उसके बाद अनुसूचित जाति पर तंज कसते हैं। तंज कसने वालों में 'सवर्ण महिलाएं' भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है जो स्वयं 30 % के दायरे में आती है। उनकी तरक्की के लिए यह अतिआवश्यक कदम था।पर उनके भीतर का 'ब्राह्मणवाद'  नौकरी पाने के बाद फिर अपनी जातीय कटुता और कट्टरता दिखा देता है। कुछ समय पहले स्वयं को लोकसंस्कृति की पुरोधा समझने वाली एक यूट्यूबर से मेरी इस बारे में बहस हुई थी। 

आख़िर में बात करता हूँ मेरी नज़र में क्या अनुसूचित जाति/जनजाति के आरक्षण में सुधार की आवश्यकता है? बिल्कुल है। इस बात में कोई शक नहीं है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के भीतर अपना एक अलग 'ब्राह्मणवाद' अपनी पैठ बना चुका है।जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो चुकी है उन्हें क्यों अब आरक्षण दिया जाए इस पर विचार किया जाना चाहिए और यह लागू होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर एक कथित निम्न जाति के आईएएस या प्रोफ़ेसर के बच्चों को क्यों आरक्षण दिया जाना चाहिए? क्यों उसी तबके के और ग़रीब और असहायों को यह मौक़ा नहीं मिलना चाहिए? उन्हें इसकी ज़्यादा ज़रूरत है।इसके बिना एक वर्ग वंचित ही रह जाएगा। जैसे EWS आने के बाद भी कथित सवर्णों में जिस तबके को इसका फ़ायदा मिलना चाहिए था उनका हिस्सा उन्हें मिल रहा है जो पहले से ही अच्छी जगह पर क़ाबिज़ है।

नौकरी या ओहदा पा जाने से जातिगत टिप्पणियाँ/ भेदभाव / अपमान/ जातिगत हत्याएँ कभी कम नहीं होंगी यह कथित निम्न जातियों को समझ रहा है, और यह स्पष्ट है।पर मेरा निजी तौर पर मानना है, कि क्रीमी लेयर जैसे सुधारों की आरक्षण पाने वाले तबकों में बहुत जरूरत है, बशर्ते यहाँ भी अधिकारी EWS जैसी धांधली ना करें!


टिप्पणियाँ

  1. यूट्यूबर नीतीश राजपूत की एक बात मुझे काफी सार्थक लगी। उनके अनुसार आरक्षण किसी एक विशेष जाति को लाभ पहुँचाने के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि सदियों से जिन समुदायों के साथ सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक अन्याय हुआ, उन्हें समान अवसरों के स्तर तक लाने के लिए लाया गया था।

    इसी बात को एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि किसी परिवार का एक सदस्य शारीरिक या मानसिक रूप से अन्य सदस्यों की तुलना में कम सक्षम हो, तो उसे यह नहीं कहा जा सकता कि वह भी बिना किसी अतिरिक्त सहायता के बाकी लोगों की तरह जीवन जीए। उसे बराबरी के स्तर तक लाने के लिए अतिरिक्त संसाधनों और सहयोग की आवश्यकता होती है। ठीक इसी सोच के साथ संविधान ने उन वर्गों को विशेष अवसर देने का प्रावधान किया, जो लंबे समय तक शोषण और भेदभाव का सामना करते रहे।

    यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि संविधान लागू होने से पहले शिक्षा, प्रशासन और आर्थिक अवसरों पर लगभग पूरी तरह कुछ उच्च वर्गों का ही वर्चस्व था। ऐसे ऐतिहासिक असंतुलन को कम करने और समाज में समान अवसर स्थापित करने के उद्देश्य से आरक्षण व्यवस्था लागू की गई।

    लेकिन आज समय के साथ एक नया प्रश्न भी सामने आता है। क्या आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए? मेरा उत्तर है—नहीं। विशेषकर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की वर्तमान सामाजिक और शैक्षिक परिस्थितियों को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि अगले 60–70 वर्षों तक इसे पूरी तरह समाप्त करना उचित होगा।

    हालाँकि, सुधार की आवश्यकता अवश्य है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि सरकार इस दिशा में विचार कर सकती है कि यदि किसी आरक्षित परिवार का एक सदस्य आरक्षण के माध्यम से ग्रेड A या ग्रेड B की सरकारी सेवा में चयनित हो जाता है, तो उसकी अगली पीढ़ी को वही लाभ स्वतः न मिले। इससे उस आरक्षण का लाभ उसी आरक्षित वर्ग के किसी ऐसे परिवार तक पहुँच सकेगा, जिसे अभी तक अवसर नहीं मिला है।

    इस प्रकार आरक्षण का लाभ कुछ सीमित परिवारों तक बार-बार पहुँचने के बजाय अधिक से अधिक वंचित परिवारों तक पहुँचेगा। इससे आरक्षित वर्ग के भीतर भी समान अवसर बढ़ेंगे और समाज में सवर्ण एवं दलित समुदायों के बीच मौजूद सामाजिक-आर्थिक अंतर अपेक्षाकृत तेजी से कम हो सकता है।

    निष्कर्ष:
    मेरे अनुसार आरक्षण व्यवस्था को हटाने की नहीं, बल्कि समय के अनुरूप अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बनाने की आवश्यकता है, ताकि इसका लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुँचे जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी।
    इसी प्रकार ग्रेड C और ग्रेड D की सरकारी सेवाओं के लिए भी अलग नीति बनाई जा सकती है। इन पदों पर कार्यरत कर्मचारियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति, ग्रेड A और B के अधिकारियों से अलग होती है। इसलिए इनके लिए आरक्षण का लाभ पूरी तरह समाप्त करने के बजाय कुछ सीमित या संशोधित व्यवस्था रखी जा सकती है, ताकि वास्तव में जरूरतमंद परिवारों को अवसर मिलता रहे और आरक्षण का उद्देश्य भी पूरा होता रहे।

    अर्थात्, सुधार ऐसा होना चाहिए जिससे न तो आरक्षण का मूल उद्देश्य प्रभावित हो और न ही इसका लाभ केवल कुछ चुनिंदा परिवारों तक सीमित रह जाए।

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