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Kausani: Beyond the majestic Himalayas

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  चित्र: euttranchal.com गांधी जी के द्वारा 'भारत का स्विट्ज़रलैंड' कहा गया ये नगर कौसानी यूँ तो सामने दिखती कत्यूर घाटी एवं सामने दृश्य हिमालयी चोटियों के लिए ज़्यादा ख़ास जगह रखता है, पर कुछ और भी है जो इसे और ज़्यादा अद्भुत बनाता है। बारी बारी से तीनों पर बात करते है। 1. लक्ष्मी आश्रम अथवा सरला आश्रम इसका मूल नाम कस्तूरबा महिला उत्थान मण्डल है परंतु यह लक्ष्मी आश्रम या सरला आश्रम के नाम से ज़्यादा जाना जाता है।इंटरनेट से प्राप्त सूचना मिलने पर पता चला कि, शुरुआत में यहाँ 4 कमरों में जिस स्कूल की शुरुआत हुई उसके लिए ज़मीन एक लोकल सिविल सर्विस ऑफिसर ने मुहैया कराई, जिनकी पत्नी का नाम लक्ष्मी था इसलिए यह लक्ष्मी आश्रम कहा गया, पर कालांतर में 5 दिसंबर 1946 को सरला बहन( मूल नाम Catherine Mary Heilemann) द्वारा जब यहाँ कस्तूरबा महिला उत्थान मण्डल की स्थापना की गई तब से लोग इसे सरला आश्रम के नाम से भी जानते है।मुख्य कौसानी बाज़ार से लगभग 200-300 मी० की दूरी पर जंगल के बीच सुरम्य स्थान पर यह स्थित है। सरला बहन, का जन्म 1901 में लंदन में हुआ। उनकी अपनी पढ़ाई लिखाई लंदन में ही हुई, बाक...

Privilege

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  Film: The boy in the striped Pajamas आख़िर साहित्य या सिनेमा का मक़सद है क्या? मनोरंजन, सूचना या और भी कुछ? मुझे लगता है सामाजिक बदलाव प्रत्यक्ष ना सही पर परोक्ष रूप से इसका एक मक़सद होगा या होना चाहिए। हाल में मैंने जो फ़िल्म देखी वो थी - हॉलीवुड कि फ़िल्म The boy in the striped Pajamas  जो कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुए Holocaust पर आधारित है और एक ही उम्र के (8 साल) दो बच्चो (ब्रूनो और श्मूल) की स्थिति को बयाँ करती है।उस फ़िल्म को देखने के बाद ही कुछ विचार मन में कौंधे। क्या समाज में privilege वर्ग को कभी महसूस होता भी है कि वो privilege स्थिति में है? एक देश में जैसे जिस धर्म की majority हो उसे कभी ये समझ नहीं आता वो minority से privilege है। एक धर्म विशेष में तथाकथित ऊँचे वर्ण को अपना privilege कभी महसूस नहीं होता। पुरुषों को महिलाओं के ऊपर अपना privilege नही दिखता और महिला और पुरुष दोनों को थर्ड जेंडर के ऊपर अपना privilege नज़र नहीं आता। उपरोक्त फ़िल्म का एक दृश्य है जिसका चित्र नीचे डाला जा रहा है  पॉवेल एक बूढ़ा व्यक्ति है, जिसने डॉक्टर बनने की practice की ह...

परंपरा के नाम पर अंधविश्वासों का समर्थन

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 8 जनवरी 2023, को सुल्तानपुर में एक माँ ने अपने बच्चे की बलि दे दी! कारण मनोकामना पूर्ति। 12 अक्तूबर 2022, केरल में दो महिलाओं का सर कलम कर, टुकड़े कर दिये गये! कारण मनोकामना पूर्ति। 1 जुलाई 2018, दिल्ली के बुराड़ी में 11 लोगों के शव एक साथ बरामद हुए, जिसमें एक वृद्धा, महिलायें, पुरुष, एक जवान महिला(कॉर्पोरेट जॉब) और बच्चे सब शामिल थे। कारण मनोकामना पूर्ति! वर्ष 2002, पाकिस्तान में रिपोर्टर डैनियल पर्ल का सर काट दिया जाता है, आतंकवादियों द्वारा। क्या पहली तीन घटनायें चौथी घटना से किसी तरह अलग है?  हाँ, चौथी घटना का उद्दयेश्य केवल अपना शक्ति प्रदर्शन है जबकि पहले तीन का अपनी इच्छा पूर्ति! विदेशों का पता नहीं, पर अपने देश में तो हर जगह ऐसे हज़ारों अंधविश्वास प्रचलित है, जिनका निवारण केवल 'बलि' है। यह जानवर की सामान्यतः होती है, उस कमजोर जानवर की, जो किसी कारण अक्षम है। बकरे या बैल या भैंस की इसलिए क्योंकि वो ज़्यादा दूर भाग नहीं सकते, आपने किसी भी तथाकथित सभ्यता में शेर, तेंदुए या बाघ की बलि सुनी? नही! पक्षियों में आपने मुर्ग़े या मुर्गी को इसलिए चुना क्योंकि वह ज़्यादा दूर नही ...

एक पहाड़ी गाँव की लड़की

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 ऊपर तस्वीर हर पहाड़ी गाँव की हर लड़की का बिंब है।इसलिए नाम या जगह लिखने की कोई वजह मेरे पास नहीं है।  “बेटी का सबसे पहला हक़ हम खा जाते है, वो है उसके पैदा होने की ख़ुशी” उर्दू के  बेबाक़ लेखक सआदत हसन मंटो कि ये पंक्तियाँ देश के लगभग हर समाज (शायद उत्तर पूर्व में ना हो)  में सटीक बैठती है। ये बात शत प्रतिशत सही न भी हो पर ज्यादा हिस्सा इस बात से इनकार नहीं कर सकता। अपनी लेखनी से  मंटो, इस्मत चुगताई, प्रेमचंद और मन्नू भंडारी जैसे लेखकों ने महिलाओं के दर्द को जगज़ाहिर किया।पहाड़ की बात करूँ तो हिमांशु जोशी जी के उपन्यास ‘ कगार की आग’ में पार्वती को पढ़कर किसके आंसू नहीं गिरे होंगे? यदि महिला है तो उसका जीवन परेशानी का सबब है और अगर वो दलित महिला है तो ये परेशानी अंतहीन हो जाती है, जो पार्वती का किरदार भी दिखाता है। पहाड़ में एक लड़की की ज़िंदगी एक आम लड़की से कहीं ज़्यादा चुनौती वाली है।अब लगभग हर घर में या गाँव में नल लग चुके है, पर आज से 5-6 साल पहले तक पानी नौले या धारे से लाना होता था, जो काम माँओं का या बेटियों के सर ही होता था। उसके बाद खाने की जुगत में मा...

जितनी मिट्टी, उतना सोना- किताब समीक्षा

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  जितनी मिट्टी, उतना सोना…लपूझन्ना और तारीख़ में औरत सरीखी किताबों के लेखक अशोक पाण्डे जी की किताब है, जिसे हिन्द युग्म ने प्रकाशित किया है और क़ीमत 249 रुपये मात्र है।( किताब के डेटा के हिसाब से मात्र शब्द जानबूझकर लगाया है) धारचूला में तीनों घाटियों- दारमा, व्यास और चौदास में रं समाज पर केंद्रित यह किताब, बहुत तफ़सील से नहीं पर अच्छे ख़ासे ब्यौरे के साथ आपको इस समाज की जीवनशैली, संस्कृति, पूजा पद्धतियों,ढेरों मिथकों,उनकी कहानियों से रूबरू करवाती है। किताब पढ़ने से पहले मेरी ये राय है, आख़िरी पन्ने में हमारे मित्र विनोद उप्रेती जी द्वारा बनाये गये इन तीनों घाटियों के नक़्शे को ज़रूर देख लें, इससे लगभग 25 साल पहले की अकादमिक यात्रा पर निकलें, अशोक और ऑस्ट्रियन शोधार्थी सबीने के साथ आप ख़ुद को भी कदम दर कदम रास्तों पर पायेंगे। अशोक जी का लेखन कितना आसान और मनोरंजक होता है ये लपूझन्ना पढ़े पाठक बख़ूबी जानते है! जिन्हें नहीं पता वो भी ये समझ लें, कि आपका कोई बढ़िया दोस्त आपको कहीं का कोई क़िस्सा सुना रहा है। ये किताब आपको पिथौरागढ़ में धारचूला से आगे पहले दारमा घाटी यानी, दर,सोबला, ना...

Gwaldam- a town amidst the Deodar Forest

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    बागेश्वर जिले (कुमाऊँ) से लगते चमोली जिले(गढ़वाल) का पहला क़स्बा- ग्वालदम। चमोली जिला मुख्यालय से इसकी दूरी 126 Kms है जबकि अगर बागेश्वर से देखें तो ये दूरी केवल 40 Kms है इसलिए इस क़स्बे के लिए बाज़ार बागेश्वर या गरुड़ ज़्यादा मुफ़ीद है। 1960 Mts की ऊँचाई पर स्थित ये क़स्बा जून के महीने में भी, आपको दिसंबर की ठंड के दर्शन करवा सकता है। सामने त्रिशूल (7120Mts) और नंदा घूँटी(6309 Mts) पर्वत की सफ़ेद चोटिया सामने दिख जायेंगी, अगर क़िस्मत में साफ़ मौसम हो तो! ख़ूबसूरती से लबरेज़ ये छोटा सा क़स्बा बड़े छोटे से हिस्से में देवदार के जंगल, प्राकृतिक तालाब और गढ़वाली-कुमाउनीं संस्कृति से महदूद है, जिसमें क़स्बे से 1 Kms आगे जाकर आपको मार्छा या भोटिया जनजाति की झलक भी मिल जाएगी।शायद ही ऐसा कोई साल हो जब यहाँ बर्फ़ अपनी दस्तक ना दे! यहाँ सबसे खूबसूरत जगह जो आपको लगेगी वो है, ग्वालदम के नये बाज़ार में मौजूद, प्राकृतिक तालाब जिसका हरा पानी और उसमे तैरती लाल मछलियाँ आपको ज़रूर सम्मोहित करेंगी।  मैंती आंदोलन, जो कि राजकीय इंटर कॉलेज ग्वालदम के एक शिक्षक श्री कल्याण सिंह रावत जी के द...

Lakhudiyar Caves- A Paleolithic age Caves In AlmoraUttarakhand

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ज़िला मुख्यालय अल्मोडा से  लगभग 16-17 Kms, NH-309B (पिथौरागढ़ की ओर) बढ़ने पर पर चितई मंदिर से आगे सड़क के पास ही दाहिने हाथ पर आपको यह बोर्ड दिख जाएगा। यह सुयाल नदी के किनारे पर है, जो एक छोटी नदी है। होने को ASI के दायरे में ये जगह है पर ख़्याल रखने वाला कोई दिखता नहीं! गुजरते हुए, जब लखुडियार की ओर से आते हुए एक परिवार से मैंने पूछा, कितनी दूरी पर है? मैं जानता था पर बस अनायास ये मुँह से निकल पड़ा तो जवाब था, “पता नहीं भाईसाहब।”  जबकि ये गुफा भित्तिचित्र( Cave rock paintings) सड़क से महज़ कुछ कदमों की दूरी पर है! वो परिवार उसी के ऊपर बैठकर शायद पिकनिक मनाकर आ रहा था।लेकिन उन चित्रों से मुख़ातिब नही था।पुरा-पाषाण(paleolithic) दौर में आदिमानव वहाँ रहने की तलाश में गया होगा, आधुनिक दौर में लोग मौजमस्ती के लिए। भारत में इतिहास की किताबों में हम भीमबेटका (मध्य प्रदेश) में भित्ति चित्रों के बारे में पढ़ा है , कक्षा 11 की NCERT की Fine Arts की किताब में  लखुडियार का ज़िक्र है। पर अल्मोडा के लोगो को भी इसके बारे में ज़्यादा पता या रुचि नहीं है। बिल्कुल ऐसे ही भित्ति चित्र आपको...